संझा की ओट में: मालवा की लुप्त होती भित्ति चित्रकारी का भविष्य
मिट्टी की महक और कुंवारी लोक-कला के बीच, संझा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्त्री-अभिव्यक्ति का एक मौन घोषणापत्र है।

सांझ की देहरी पर उकेरा गया एक विस्मृत स्वप्न
सितंबर की उमस भरी दोपहरी में जब मालवा की धूल भरी हवाएँ नीम के पत्तों से टकराती हैं, तो उज्जैन और इंदौर के भीतरी इलाकों में एक अलग ही हलचल शुरू होती है। यह पितृपक्ष का समय है, जिसे आमतौर पर शोक या तर्पण से जोड़ा जाता है। लेकिन यहाँ की गलियों में, खास तौर पर किशोरियों और महिलाओं के हाथों में गोबर, ताजे फूल और चमकदार पन्नियाँ (पन्नी) दिखाई देने लगती हैं। यह तैयारी है 'संझा' की—एक ऐसी कला जो न किसी आर्ट गैलरी में बिकती है और न ही किसी संग्रहालय की शोभा बढ़ाती है। यह मिट्टी की दीवारों पर हर दिन रची जाती है और अगले दिन नए रूप में ढल जाती है।
संझा केवल एक चित्रकारी नहीं है; यह एक 16 दिवसीय अनुष्ठान है, जो कुंवारी लड़कियों द्वारा एक अच्छे भविष्य और सुयोग्य वर की कामना के लिए किया जाता है। लेकिन यदि हम इसकी परतों को खुरचें, तो हमें इसमें सामुदायिक सामंजस्य और पारिस्थितिक चेतना के गहरे पदचिह्न मिलते हैं। आज के 'स्मार्ट सिटी' दौर में, क्या हम इस अनमोल विरासत को कंक्रीट के जंगलों में खो रहे हैं? आइए इस कला के आध्यात्मिक और सामाजिक पक्ष को बारीकी से समझें।
संझा की बनावट: प्रतीक और प्रकृति का संगम
संझा की रचना प्रक्रिया अपने आप में पर्यावरण के प्रति सम्मान का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री पूरी तरह से प्राकृतिक होती है। गाय का गोबर, जिसे 'लीपना' कहा जाता है, कैनवास का काम करता है। ऊपर से गुलबाँस के फूल, चमेली की कलियाँ और खजूर के पत्तों से आकृतियाँ उकेरी जाती हैं।
नीचे दी गई तालिका संझा में उपयोग किए जाने वाले पारंपरिक प्रतीकों और उनके अंतर्निहित अर्थों को स्पष्ट करती है:
| प्रतीक (आकृति) | आध्यात्मिक/सामाजिक अर्थ | महत्व |
|---|---|---|
| पाटा और सिधाई | गृहस्थ जीवन की नींव | पहले दिन की शुरुआत |
| बिजौरा | उर्वरता और वंश वृद्धि | प्रकृति का आशीर्वाद |
| स्वास्तिक | शुभ ऊर्जा का संचार | नकारात्मकता का नाश |
| पंखा | सेवा और समर्पण | आतिथ्य सत्कार का प्रतीक |
| किला-कोट | सुरक्षा और अखंडता | अंतिम दिन की भव्य रचना |
"संझा केवल दीवारों पर गोबर चिपकाना नहीं है, यह उन लड़कियों की सामूहिक आवाज़ है जो गीतों के माध्यम से अपनी आकांक्षाओं को समाज के सामने रखती हैं। यह एक अस्थायी गैलरी है जो हर सुबह नष्ट हो जाती है और दोपहर को पुनः जीवित होती है।"
क्यों पिछड़ रही है यह लोक परंपरा?
आधुनिकता की दौड़ में संझा का ह्रास होने के कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण है शहरी वास्तुकला में बदलाव। पुराने कच्चे घरों की जगह अब पुट्टी और पेंट वाली दीवारों ने ले ली है, जहाँ गोबर का चिपकना असंभव है। इसके अलावा, किशोरियों का झुकाव डिजिटल मनोरंजन की ओर अधिक हो गया है।
संझा के गीतों में अक्सर एक शिकायत होती है—ससुराल की पाबंदियों और मायके की यादों की। लेकिन आज की पीढ़ी इन गीतों के मर्म से कटती जा रही है।
ग्रामीण बनाम शहरी: स्वरूप में बदलाव
| विशेषता | ग्रामीण संझा | शहरी संझा (आधुनिक रूप) |
|---|---|---|
| कैनवास | गोबर से लिपी मिट्टी की दीवार | रेडीमेड स्टिकर या कागज के बोर्ड |
| सामग्री | ताजे फूल और झाड़ की पत्तियां | कृत्रिम रंग और प्लास्टिक फूल |
| सामूहिकता | पूरे मोहल्ले की लड़कियाँ एकत्रित होती हैं | एकल या बहुत कम भागीदारी |
| गीत | ढोलक और तालियों के साथ पारंपरिक राग | मोबाइल पर बजते रिकॉर्डेड गाने |
क्या संझा का बाज़ारीकरण समाधान है?
कुछ कलाकारों ने संझा को कैनवास और एक्रिलिक रंगों पर उतारने की कोशिश की है ताकि इसे संरक्षित किया जा सके। मध्य प्रदेश के 'भारत भवन' जैसे संस्थानों ने इसे पुनर्जीवित करने के प्रयास किए हैं। लेकिन यहाँ एक मौलिक प्रश्न उठता है कि क्या किसी अनुष्ठान को उसकी 'अस्थायिता' (ephemerality) से अलग करके उसका संरक्षण किया जा सकता है? संझा की सुंदरता उसके मिट जाने में ही है।
संझा के लोकगीत: सामाजिक न्याय का स्वर
संझा के दौरान गाए जाने वाले गीत ग्रामीण समाज की पितृसत्तात्मक संरचना पर एक मीठा कटाक्ष होते हैं। उदाहरण के लिए: "संझा बाई का ससुराल बड़ा दूर, जहाँ मिलते हैं सिर्फ सूखे खजूर।" यहाँ लड़कियाँ अपनी चिंताओं को हंसी-मजाक में पिरोकर पेश करती हैं। यह एक सुरक्षित मानसिक स्थान (Safe Space) प्रदान करता है जहाँ वे अपनी इच्छाएँ व्यक्त कर सकें।
"लोक कलाएँ समाज के अवचेतन का दर्पण होती हैं। यदि संझा लुप्त होती है, तो हम अपनी मिट्टी के उस आखिरी संवाद को खो देंगे जो सीधे प्रकृति से जुड़ता था।"
संरक्षण के आधुनिक तरीके: हम क्या कर सकते हैं?
- डिजिटल आर्काइविंग: संझा के विभिन्न क्षेत्रीय प्रारूपों की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी।
- स्कूल पाठ्यक्रम: मालवा के स्थानीय स्कूलों में कला शिक्षा के तहत संझा निर्माण को शामिल करना।
- इको-फ्रेंडली किट: आधुनिक घरों के लिए ऐसी किट तैयार करना जो बिना दीवार खराब किए संझा निर्माण की अनुमति दे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
संझा पर्व कब मनाया जाता है?
यह पर्व प्रतिवर्ष श्राद्ध पक्ष (पितृपक्ष) के 16 दिनों के दौरान मनाया जाता है, जो आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर के महीने में आता है।
क्या यह केवल धार्मिक अनुष्ठान है?
नहीं, यह एक सांस्कृतिक और कलात्मक उत्सव है। यद्यपि इसमें देवी रूप की पूजा होती है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य किशोरियों को कलात्मक कौशल सिखाना और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाना है।
मालवा के अलावा यह कला कहाँ दिखाई देती है?
राजस्थान के कुछ हिस्सों में इसे 'सांझी' के नाम से जाना जाता है, हालाँकि वहाँ की शैली और सामग्री में थोड़ा अंतर होता है। ब्रज क्षेत्र में सांझी मंदिर की सजावट का हिस्सा होती है।
निष्कर्ष: मिट्टी की पुकार
संझा केवल एक अतीत की याद नहीं होनी चाहिए। यह हमारे पारिस्थितिक संतुलन और कलात्मक ईमानदारी का प्रतीक है। जब हम अपनी जड़ों की ओर मुड़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि 'संस्कृति' उन छोटी-छोटी रेखाओं में बसी है जो एक छोटी सी लड़की गोबर से दीवार पर खींचती है। इसे बचाने का अर्थ है अपनी मौलिकता को बचाना।
“संझा की रेखाओं में सिर्फ गोबर नहीं, बल्कि मालवा की मिट्टी का धड़कता हुआ इतिहास और स्त्री-हृदय की उमंगें बसी हैं।”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- संझा कला में कौन सी सामग्री उपयोग की जाती है?
- इसमें मुख्य रूप से गाय का गोबर, गुलबाँस के फूल, चमेली, खजूर के पत्ते और रंगीन पन्नियों का उपयोग किया जाता है।
- संझा का अंतिम दिन 'किला-कोट' क्या है?
- सोलहवें दिन एक विशाल आकृति बनाई जाती है जिसे किला-कोट कहते हैं, इसमें पूरे 16 दिनों की कलाकृतियों का समावेश होता है।
- क्या संझा कला का कोई व्यवसायिक मूल्य है?
- पारंपरिक रूप से यह गैर-व्यावसायिक है, लेकिन हाल के वर्षों में इसे कैनवास पेंटिंग के रूप में प्रदर्शित किया जाने लगा है।
